शबरी के वंशजों संग दीपोत्सव गंजडी में झोपड़ियों ने जब रामायण की रोशनी ओढ़ ली।
*तारुन ब्लॉक के गंजडी गाँव में 150 शबरीवंशी परिवारों ने बाँटी खुशियाँ*
*जब दीप जले, तो लगा जैसे प्रेम और परंपरा एक साथ जगमगा उठी हो*
अयोध्या।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की नगरी में इस बार दीपावली कुछ अलग थी।यह भव्य दीपोत्सवों की चमक से परे, उन झोपड़ियों में मनी जहाँ तेल का दीप जलाना भी किसी पर्व से कम नहीं।
तारुन विकास खण्ड के ग्राम पंचायत तारडीह के माजरा गंजडी में करीब 150 शबरीवंशी परिवार निवास करते हैं वही शबरी, जिन्होंने प्रेम से प्रभु श्रीराम को बेर खिलाए थे। समय बदला, राम लौटे, पर शबरी के वंशज अब भी उसी सादगी और श्रम की रोशनी में जीते हैं।
धनतेरस की शाम गाँव के बच्चे मिट्टी के दीपक लेकर बाहर निकले, उनके चेहरों पर मिट्टी की धूल थी, पर आँखों में चमक थी।
उस दिन जिला पंचायत सदस्य हरिश्चंद्र निषाद ने गाँव पहुँचकर दीपावली का उपहार बाँटा
चूरा, लाई, मिठाई, अगरबत्ती, मोमबत्ती, माचिस, बिस्कुट…
छोटे-छोटे पैकेट, लेकिन भीतर भरा अपनापन।
हरिश्चंद्र निषाद पिछले आठ वर्षों से लगातार इस परंपरा को निभा रहे हैं। वो कहते हैं दीपावली तब पूरी होती है जब किसी गरीब की चौखट भी उजाला महसूस करे।
गंजडी के बुजुर्ग रामलखन निषाद कहते हैं हम लोग माँ शबरी के वंशज हैं। वो जैसे प्रेम से बेर खिलाई थीं, वैसे ही हम भी खुशी बाँटते हैं, चाहे जितनी छोटी क्यों न हो। गाँव की महिलाओं ने मिट्टी के दीये में घी नहीं, सरसों का तेल डाला पर दीये वैसे ही झिलमिलाए जैसे अयोध्या के घाटों पर जलते हैं। फर्क सिर्फ इतना था कि यहाँ श्रद्धा ने तेल का काम किया और आत्मीयत
ने बाती का।
*जब झोपड़ी में रोशनी पहुँची, तो बच्चा बोला -“माँ, अब हमारे घर भी दीया जला है!*
गंजडी की एक झोपड़ी में आठ वर्षीय बालक ने कहा माँ, अब हमारे घर भी दीया जला है… राम आए होंगे क्या? यह वाक्य सुनकर गाँव की वृद्धा रमा देवी की आँखें नम हो गईं। कहा हाँ बेटा, जहाँ प्रेम होता है, वहाँ राम खुद आते हैं।
इन उपहारों का मूल्य बाज़ार में भले कुछ रुपये हो, पर इनके पीछे छिपा अपनापन लाखों में था।
यह आयोजन कोई राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक सामूहिक स्मरण था कि शबरी की परंपरा आज भी जीवित है।
हरिश्चंद्र निषाद बोले “दीप सिर्फ तेल से नहीं जलते दीप सिर्फ तेल से नहीं जलते,वे तब जलते हैं जब किसी का दिल किसी और के लिए रोशनी बनने को तैयार हो। यह पंक्ति गंजडी की मिट्टी में सच्चाई बनकर उतर गई। अयोध्या के दीपोत्सव में लाखों दीये जलते हैं,
पर गंजडी के इन 150 दीयों की लौ शायद सबसे निर्मल है
क्योंकि इन्हें कोई मंत्री, कोई योजना नहीं, बल्कि मनुष्य के मन की दया ने जलाया है।
Author: Rainbow News Hindustan
Mo.9414526432





