ईद मिलाद-उन-नबी (बारावफात) के जुलूस के बीच मुस्लिम समाज ने रोकी शोभायात्रा, हिंदू महिला की अर्थी को दिया रास्ता।

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चितौडगढ नरेन्द्र सेठिया की रिपोर्ट

ईद मिलाद-उन-नबी (बारावफात) के जुलूस के बीच मुस्लिम समाज ने रोकी शोभायात्रा, हिंदू महिला की अर्थी को दिया रास्ता

चित्तौड़गढ़। शहर में बुधवार को ईद मिलाद-उन-नबी (बारावफात) के अवसर पर धार्मिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की मिसाल देखने को मिली। ईद मिलाद-उन-नबी (बारावफात) के जुलूस के दौरान सामने से एक हिंदू महिला की अंतिम यात्रा आती देख मुस्लिम समाज के लोगों ने जुलूस और डीजे को कुछ समय के लिए रोक दिया तथा अर्थी को आगे जाने के लिए रास्ता उपलब्ध कराया।

जानकारी के अनुसार, शहर निवासी सारदा देवी जायसवाल की अंतिम यात्रा बुधवार को श्मशान के लिए रवाना हुई थी। इसी दौरान रास्ते में सामने से ईद मिलाद-उन-नबी (बारावफात) का जुलूस आ रहा था। अंतिम यात्रा को आते देख जुलूस में शामिल मुस्लिम समाज के लोगों ने तत्काल जुलूस को विराम दिया और अर्थी को सम्मानपूर्वक आगे निकलने के लिए रास्ता दिया।

इस दौरान मुस्लिम समाज के कई लोग दिवंगत महिला की अंतिम विदाई के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए हाथ जोड़कर खड़े नजर आए। उन्होंने शोकाकुल परिजनों और अंतिम यात्रा में शामिल लोगों के प्रति सम्मान प्रकट किया। जुलूस में शामिल लोगों ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए अंतिम यात्रा को सम्मान दिया।

दिवंगत सारदा देवी जायसवाल के प्रपौत्र अक्की जायसवाल ने बताया, “यह मेरी परदादी की अंतिम यात्रा थी। इस दौरान पुलिस और प्रशासन ने भी हमारी सहायता की। मुस्लिम समाज के लोगों ने भी अपने डीजे और जुलूस को रोककर रखा, ताकि हम अपनी दादी की अंतिम यात्रा को आगे ले जा सकें। यह हमारे लिए बेहद भावुक क्षण था। सारदा देवी जायसवाल की आयु 100 वर्ष से अधिक थी। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।”

देशभर में मनाया गया ईद मिलाद-उन-नबी (बारावफात)

बता दें कि बुधवार को देशभर में ईद मिलाद-उन-नबी (बारावफात) का त्योहार मनाया गया। यह दिन इस्लामी कैलेंडर के तीसरे महीने रबी उल अव्वल की 12वीं तारीख को पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जन्म की याद में मनाया जाता है। इस अवसर पर मुस्लिम समाज की ओर से विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए और कई स्थानों पर जुलूस निकाले गए।

चित्तौड़गढ़ में इसी दौरान सामने आया यह घटनाक्रम शहर की सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी तहजीब की भावना को सामने रखता है। धार्मिक आयोजन के बीच दूसरे समुदाय की अंतिम यात्रा के सम्मान में जुलूस रोकना आपसी संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का सकारात्मक उदाहरण बना।

शहर में सामने आया यह दृश्य उन लोगों के लिए भी संदेश है, जो राजनीतिक या निजी स्वार्थ के लिए समाजों और धर्मों के बीच दूरी पैदा करने का प्रयास करते हैं। आपसी सम्मान, भाईचारा और सहयोग ही सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं। चित्तौड़गढ़ का यह प्रसंग बताता है कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाएं और एक-दूसरे के प्रति सम्मान समाज को जोड़ने का काम करते हैं।

Rainbow News Hindustan
Author: Rainbow News Hindustan

Mo.9414526432

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