अन्य के दुख दूर करने की चिंता करना परोपकार भाव है।
फालना,पाली
जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. आदि 5 मुनि भगवंत बाली से विहार कर आज श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक तपागच्छ संघ फालना के श्री सर्वोदय पार्श्वनाथ आराधना भवन में पधारे। धर्मसभा को प्रवचन देते हुए जैनाचार्यश्री ने कहा कि—
प्राप्त हुए मनुष्य जन्म और सशक्त शरीर की सफलता और सार्थकता खाने-पीने और मौज-मज़ा करने में नहीं है, बल्कि अपनी शक्ति के द्वारा दु:खी प्राणियों के दु:ख दूर करने में उपयोग करने में ही सच्ची सफलता है।
अपने दु:ख को दूर करने के लिए तो हर कोई व्यक्ति प्रयत्नशील है, परंतु स्वयं के दु:ख की चिंता करने तो मात्र स्वार्थ भाव है। स्वयं के स्थान पर जब सर्व के दु:ख की चिंता और उसे दूर करने का प्रयत्न करना परोपकार भाव है।
परोपकारी व्यक्ति मात्र सभी के जीवन का विचार नहीं करता परंतु अन्य के दु:खों को दूर करने के लिए जरूरत पड़े तो अपने प्राणों का बलिदान देने के लिए भी तैयार हो जाता है।
16वें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ भगवान ने अपने पूर्वजन्म में मेघरथ राज्य के भव में शरण में आए एक कबूतर के प्राणों को बचाने के लिए उसके शिकार के लिए आए बाज पक्षी को अपने शरीर का माँस देने की शुभ भावना में अपने प्राणों के बलिदान देने को भी तैयार हो गए थे। इस शुभ भावना के बाल पर ही वे जगत पूज्य तीर्थंकर बने थे।
स्वार्थ भाव का त्याग कर परोपकार भाव की प्राप्ति के लिए हमें विशेष प्रयत्नशील बनना चाहिए।
दि. 13 फरवरी से 22 फरवरी तक भारूँदा नगर में तीन दिवसीय भव्य जैन मंदिर की अंजनशलाका प्रतिष्ठा महोत्सव जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. की शुभ निश्रा में होगा।
Author: Rainbow News Hindustan
Mo.9414526432





