चितौडगढ,नरेन्द्र सेठिया की रिपोर्ट
स्वाभिमान, सेवा और आत्मनिर्भरता का एक नया अध्याय,
*जब वार्ड की बेटियों ने खुद संभाल ली चुनावी रणभूमि।
*राजनीतिक रिपोर्ट — आकाश शर्मा*
चित्तौड़गढ़ । सत्ता की चौसर पर जब-जब चुनाव आते हैं, अक्सर दावों, वादों और ‘पार्षद पतियों’ की भीड़ का शोर सुनाई देता है। लेकिन राजस्थान की सड़कों और गलियों से उठती एक आवाज़ ने इस बार राजनीति के बने-बनाये ढर्रे को हिलाकर रख दिया है। यह कहानी सिर्फ एक बैलेट बॉक्स या वोट की गुणा-भाग की नहीं है,यह कहानी उस जलती हुई मशाल की है, जिसने तंगहाली के अंधेरों से निकलकर आत्मनिर्भरता का सूर्य उगाया है । इतिहास गवाह है कि महानता किसी विरासत की मोहताज नहीं होती, वो जन्म लेती है संघर्ष की गहराइयों से ! वार्ड 44 की गलियों में गूंजती यह कहानी किसी आम प्रत्याशी का चुनावी पर्चा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, तपस्या और जीजीविषा है जो हर उस बेटी की रीढ़ की हड्डी सीधी करती है, जिसे हालात झुकाने की कोशिश करते हैं । जब उम्र सिर्फ 14 बरस की थी, सिर से पिता का साया अचानक छीन गया। आँखों के सामने अनिश्चितता का अथाह समंदर था और पीछे तीन छोटे भाई-बहन। लेकिन घुटने टेकना सुनीता के शब्दकोश में था ही नहीं । नमकीन के कारोबार से उठी तेल की कढ़ाइयों का धुआँ, पसीने की एक-एक बूंद और दिन-रात का अटूट परिश्रम इसी भट्टी में तपकर तैयार हुई ‘वार्ड 44 की बेटी’। आज जब चुनाव के नाम पर वादों की रेवड़ियाँ बाँटी जा रही हैं, तब सुनीता का अतीत और काम खुद गवाही दे रहा है कि असली सेवा क्या होती है ! हालांकि सुनीता निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी रण मैदान में हैं, लेकिन जब हमने ग्राउंड पर आम मतदाताओं विशेषकर महिलाओं से चर्चा की, तो अधिकांश महिलाओं का कहना था: “चुनाव सुनीता नहीं लड़ रही हैं, हमारे वार्ड की हर महिला और बेटी खुद चुनाव मैदान में है ।”
*काम ऐसा, जो बिना पद के भी इतिहास बन गया !*
राजनीति में आने से पहले ही सुनीता ने सामाजिक सेवा और आत्मनिर्भरता का जो ढांचा तैयार किया, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है कोरोना काल में जब सब घर में थे, तब 30,000 से अधिक निःशुल्क मास्क और 100 से ज्यादा परिवारों को सूखा राशन किट पहुंचाकर चूल्हा बुझने नहीं दिया । महिला सशक्तिकरण व रोजगार में 20 से अधिक परिवारों की महिलाओं को अपने दम पर रोजगार दिया। आज वही महिलाएं स्वाभिमान से अपना घर चला रही हैं । महिला सुरक्षा और विधिक अधिकारों के लिए निरंतर निःशुल्क शिविर और जागरूकता अभियान साथ -साथ मिट्टी की बीज वाली गणपति प्रतिमाओं का नवाचार कर पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाई, जिसने कई बेटियों को आत्मनिर्भरता का नया रास्ता दिखाया। हर वर्ष 800 से 1,000 महिलाओं को जोड़कर ‘फागोत्सव’ जैसे बड़े सांस्कृतिक आयोजनों की पूरी कमान महिलाओं के हाथों में सौंपकर उनके नेतृत्व कौशल को निधारा ।
*’न पार्षद पति, न पार्षद भाई’ ऐतिहासिक बदलाव*
इस बार वार्ड 44 का चुनाव पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग है। यह चुनाव सिर्फ एक उम्मीदवार का नहीं, बल्कि स्त्री-शक्ति के स्वाभिमान का है। सुनीता शर्मा के चुनाव कार्यालय का संचालन हो, डोर-टू-डोर प्रचार हो या सोशल मीडिया की कमान ,सब कुछ वार्ड की महिलाएं स्वयं संभाल रही हैं। यहां ‘पार्षद पति’ या ‘पार्षद भाई’ की छाया का कोई काम नहीं, क्योंकि सुनीता का स्पष्ट मानना है। जब महिलाएं एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ेंगी, तभी हमारा वार्ड, समाज और देश सशक्त होगा।
*एक चुनाव से परे, नारी सशक्तिकरण की नई दिशा*
आचार संहिता के नियमों के तहत शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से लड़े जा रहे इस चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हों, वार्ड 44 की इस लड़ाई ने स्थानीय राजनीति में एक नया इतिहास दर्ज कर दिया है। यह चुनाव केवल एक प्रतिनिधि चुनने का नहीं, बल्कि महिलाओं के नेतृत्व और स्वाभिमान को स्थापित करने की एक सशक्त मुहिम बन चुका है।
Author: Rainbow News Hindustan
Mo.9414526432





