लॉकडाउन में जब दफ्तर बंद थे,SDO कोर्ट में रची गई करोड़ों की जमीनी साजिश।

SHARE:

महामारी की आड़ में ‘न्याय का कत्ल’*
लॉकडाउन में जब दफ्तर बंद थे,SDO कोर्ट में रची गई करोड़ों की जमीनी साजिश।


*तत्कालीन उपखण्ड अधिकारी सुश्री अंजू शर्मा, तत्कालीन रीडर भूपेश पालीवाल और दो अन्य के खिलाफ वारंट जारी*
चितौडगढ नरेन्द्र सेठिया की रिपोर्ट

चित्तौड़गढ़/। जहाँ एक ओर पूरा देश कोरोना की दूसरी लहर में अपनों को खो रहा था और सरकार ने ‘जन अनुशासन पखवाड़ा’ लगाकर कचहरियों पर ताले लटका दिए थे, वहीं चित्तौड़गढ़ के भदेसर में ‘खाकी और कलम’ के गठजोड़ से भ्रष्टाचार का एक ऐसा खेल खेला जा रहा था जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है । मण्डफिया न्यायालय ने तत्कालीन उपखण्ड अधिकारी (SDO) सुश्री अंजू शर्मा, तत्कालीन रीडर भूपेश पालीवाल और दो अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज बनाने और आपराधिक साजिश (धारा 420, 467, 468, 471, 120B IPC) के तहत प्रसंज्ञान लेते हुए वारंट जारी किए हैं।
लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था पर आम आदमी का भरोसा इसलिए टिका होता है कि चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थिति हो, वहां न्याय की लौ जलती रहेगी। लेकिन चित्तौड़गढ़ के भदेसर से सामने आया यह मामला उस भरोसे की बुनियाद हिला देने वाला है। यह केवल एक जमीन के नामांतरण का विवाद नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक अहंकार और भ्रष्टाचार का नग्न प्रदर्शन है, जिसने महामारी की विभीषिका को भी लूट का जरिया बना लिया। जिस समय राजस्थान ‘रेड अलर्ट जन अनुशासन पखवाड़े’ की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, गरीब जनता घरों में कैद थी, तब एक उपखण्ड अधिकारी का कार्यालय ‘सुपर फास्ट’ मोड में काम कर रहा था। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि जिस अपील को सुनने का क्षेत्राधिकार भी कोर्ट के पास नहीं था, उसे मात्र 3 पेशियों में निपटा दिया गया ?
बॉक्स
*सनसनीखेज खुलासा, मुर्दे ने दी गवाही !*
इस मामले की सबसे वीभत्स सच्चाई यह है कि जिस ‘नारू’ नामक व्यक्ति के नाम पर नोटिस तामील दिखाई गई, उसकी मृत्यु साल 2012 में ही हो चुकी थी। यानी 9 साल पहले मर चुके व्यक्ति को लॉकडाउन के दौरान ‘जिंदा’ कर दिया गया ताकि फर्जी तरीके से जमीन हड़पी जा सके। तहसीलदार की जांच में सामने आया कि न तो कोई नोटिस जारी हुए और न ही कोई तामील हुई,सब कुछ बंद कमरों में कागजों पर रचा गया ।
बॉक्स
*मुख्य बिंदु जो आप को जानने चाहिए !*
*प्रक्रिया का गला घोंटना-* नियत तारीख से पहले ही चोरी-छिपे केस की सुनवाई करना न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत (Natural Justice) की हत्या है। अगली पेशी 23 जून की थी, लेकिन चोरी-छिपे 7 जून को ही फैसला सुना दिया गया ।
*दस्तावेजों की जालसाजी-* एक मृत व्यक्ति को जिंदा दिखाकर रिपोर्ट पेश करना यह बताता है कि तंत्र के निचले स्तर से लेकर ऊपरी स्तर तक कितनी गहरी सांठगांठ थी । यें तारीख का खेल का केसे खेल खेंला गया दफ्तर बंद कर भ्रष्टाचार का खुला खेल जब आम जनता के लिए आवाजाही प्रतिबंधित थी, तब आरोपियों की फाइलें बेरोकटोक चल रही थीं।
*पद का दुरुपयोग-* एक आरएएस (RAS) स्तर के अधिकारी द्वारा कानून की धज्जियां उड़ाना यह सिद्ध करता है कि पद की गरिमा को व्यक्तिगत लाभ की वेदी पर चढ़ा दिया गया । फर्जी हस्ताक्षर का राज जांच में पाया गया कि नोटिस पर न तो चपरासी के सही दस्तखत थे और न ही तहसीलदार कार्यालय का कोई रिकॉर्ड ।
बॉक्स
*न्यायालय का यह प्रसंज्ञान !*
यह आदेश उन अधिकारियों के लिए एक कड़ा सबक है जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। ‘सद्भावनापूर्वक किए गए कार्य’ की आड़ में किए गए इन काले कारनामों का पर्दाफाश होना जरूरी था । यदि लॉकडाउन जैसे समय में भी न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग ही षड्यंत्रकारियों के साथ हाथ मिला लेंगे, तो आम आदमी अपनी फरियाद लेकर कहाँ जाएगा ? यह मामला महज एक मुकदमे की कार्यवाही नहीं है, बल्कि व्यवस्था के भीतर बैठे ‘दीमकों’ की पहचान करने का एक बड़ा अवसर है। न्याय की इस लड़ाई में मण्डफिया न्यायालय का फैसला उम्मीद की एक किरण जगाता है कि ‘कानून के हाथ लंबे होते हैं’ चाहे अपराधी कितना भी रसूखदार क्यों न हो ।

Rainbow News Hindustan
Author: Rainbow News Hindustan

Mo.9414526432

Leave a Comment