चितौडगढ नरेन्द्र सेठिया
भादसोड़ा मुख्यमंत्री निशुल्क साइकिल वितरण योजना के तहत चित्तौड़गढ़ जिले के भादसोड़ा स्थित महात्मा गांधी गवर्नमेंट स्कूल में शुक्रवार को 30 बालिकाओं को साइकिलें वितरित की गईं। सरकार का उद्देश्य यह है कि दूर-दराज से आने वाली छात्राओं को स्कूल पहुंचने में परेशानी न हो और वे पढ़ाई के लिए मोटिवेट हों।
लेकिन इस योजना के तहत दी गई कई साइकिलों में शुरुआत से ही खराबी सामने आ गई। साइकिल मिलने के बाद बालिकाएं जब खुशी-खुशी स्कूल से बाहर निकलीं तो कुछ ही दूरी पर उन्हें पता चला कि साइकिलें ठीक से चल ही नहीं पा रही हैं।
कई साइकिलों में चेन उतर रही थी, कुछ के टायर खराब थे और कुछ साइकिलें पूरी तरह संतुलित भी नहीं थीं। इस वजह से छात्राओं की खुशी कुछ ही देर में परेशानी में बदल गई।
खराब साइकिलों के कारण बालिकाओं को हुई परेशानी
साइकिलों में टेक्निकल प्रॉब्लम्स के कारण कई बालिकाएं उन्हें चला नहीं पाईं। किसी साइकिल का बास्केट टूटा हुआ था, किसी की चेन सही से नहीं लगी थी, तो कुछ साइकिलों के टायर खराब थे। कई साइकिलों में तो हवा तक नहीं भरी हुई थी।
ऐसे में बालिकाओं को साइकिल चलाने की बजाय उसे खींचते हुए सड़क तक लाना पड़ा। कुछ छात्राएं करीब दो किलोमीटर दूर से स्कूल आती हैं, लेकिन नई साइकिल मिलने के बावजूद उन्हें उसी दिन परेशानी का सामना करना पड़ा।
स्कूल से निकलने के बाद कई बालिकाएं सीधे भादसोड़ा चौराहे या भादसोड़ा गांव पर स्थित पंचर की दुकानों तक पहुंचीं, जहां उन्हें साइकिल ठीक करवानी पड़ी।
मरम्मत में भी खर्च करने पड़े पैसे
साइकिलें ठीक करवाने में बालिकाओं और उनके परिवारों को अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ा। पंचर दुकानों पर साइकिलों की मरम्मत के लिए करीब ₹200 से लेकर ₹500 तक खर्च करना पड़ा।
किसी साइकिल में चेन ठीक करनी पड़ी, किसी के टायर बदलने या हवा भरवाने का खर्च आया तो कहीं नट-बोल्ट कसवाने पड़े। योजना के तहत साइकिलें मुफ्त दी गई थीं, लेकिन खराब हालत के कारण उन्हें ठीक करवाने के लिए छात्राओं को अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़े।
इस वजह से कई अभिभावकों ने साइकिलों की गुणवत्ता को लेकर सवाल भी उठाए। हालांकि यह रुपए बहुत बड़ा अमाउंट नहीं है लेकिन क्वालिटी खराब होने के कारण बार-बार रिपेयर करवाना पड़ सकता है।
जांच और मॉनिटरिंग की उठी मांग
इस पूरे मामले के बाद अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने साइकिलों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि अगर बच्चों की सुविधा के लिए सरकार कोई योजना चला रही है तो उसकी गुणवत्ता की पूरी तरह जांच और मॉनिटरिंग होनी चाहिए।
साइकिलें स्कूल में पहुंचने के बाद उन्हें बांटने से पहले ठीक से चेक किया जाना चाहिए था, ताकि छात्राओं को ऐसी परेशानी का सामना न करना पड़े।
कई लोगों का मानना है कि यदि साइकिलों की पहले ही जांच कर ली जाती तो बालिकाओं को उसी दिन मरम्मत के लिए दुकानों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते।
प्रिंसिपल ने बताई वितरण की वजह
वहीं, स्कूल की प्रिंसिपल ज्योति शर्मा का कहना है कि साइकिलें लोड होकर स्कूल में आई थीं और उस समय परीक्षाएं भी चल रही थीं। ऊपर से साइकिलों को तुरंत वितरित करने के निर्देश थे, इसलिए उन्हें बिना देर किए बालिकाओं को बांट दिया गया।
उन्होंने बताया कि साइकिलों में क्या-क्या कमी है, इसका पहले से पता नहीं था। अब सामने आई शिकायतों के बाद इस मामले को देखा जाएगा।
भादसोड़ा निवासी यामिनी आचार्य ने बताया कि वह 9वीं कक्षा में पढ़ती है। उन्हें पहले जो साइकिल दी गई, उसका स्टैंड हटते ही चेन टूट गई। इसके बाद बदलकर दूसरी साइकिल ली तो उसका बास्केट टूटा हुआ था। फिर तीसरी साइकिल ली, जो सही लगी, लेकिन स्कूल से निकालते ही उसका टायर फट गया। इसके बाद भादसोड़ा चौराहे पर टायर पंचर की दुकान पर साइकिल ठीक करवाई, जिसके लिए 200 रुपए का भुगतान करना पड़ा।
भादसोड़ा निवासी लोकेश टेलर ने बताया कि उनकी बेटी गरिमा टेलर 9वीं कक्षा में पढ़ती है। उसे भी निशुल्क साइकिल मिली, लेकिन उसकी साइकिल का पिछला व्हील बेंड हो गया था। इसके अलावा भी कुछ टेक्निकल प्रॉब्लम थी, जिसके कारण साइकिल को वापस रिपेयर करवाना पड़ा। इसमें करीब 250 से 300 रुपए तक का खर्च आया। उन्होंने कहा कि साइकिल की क्वालिटी अच्छी नहीं है। अगर, बच्चों की सुविधा के लिए कुछ दिया जा रहा है तो उसकी पूरी मॉनिटरिंग होनी चाहिए और इसकी जांच भी की जानी चाहिए।
भूरा लाल माली ने बताया कि साइकिल निशुल्क जरूर मिली, लेकिन दोनों पहियों में हवा नहीं थी और दोनों पहिए टेढ़े थे। इन्हें ठीक करवाने में करीब 200 से 300 रुपए खर्च हुए, लेकिन इसके बावजूद पहिया सही नहीं हुआ। इसी कारण उनकी बेटी पूजा माली साइकिल नहीं चला पा रही है। साइकिल के ब्रेक भी सही नहीं हैं।
साइकिल ठीक करने वाले सलीम मोहम्मद ने बताया कि पहले भी सरकारी साइकिलें ठीक करवाने के लिए बालिकाएं उनके पास आती थीं और इस साल भी ऐसी साइकिलें आई हैं। इनमें नट-बोल्ट ठीक से टाइट नहीं होते, चेन सही ढंग से नहीं लगाई जाती और रिंग का काम भी सही नहीं होता। ऐसे में साइकिलों की दोबारा सर्विस करनी पड़ती है, जिसमें कम से कम 200 रुपए या उससे ज्यादा का खर्च हो ही जाते हैं।
एक और साइकिल ठीक करने वाले इंद्र सिंह तंवर ने बताया कि उनके पास बालिकाओं को दी गई करीब 4–5 साइकिलें ठीक करवाने के लिए आई थीं। इनमें फिटिंग बहुत ढीली थी और पार्ट्स भी बेहद घटिया क्वालिटी के थे। दोनों पहियों में बेंड था और साइकिलों को जैसे-तैसे उठाकर डाल दिया गया था, जिससे चेसिस में भी बेंड आ गया। कई साइकिलों में चेन सेट ही नहीं हो पा रही थी। उन्होंने बताया कि बोल्ट इतने ढीले थे कि उन्हें हाथ से ही खोला जा सकता था, पाना या पेचकस की भी जरूरत नहीं पड़ती। साइकिलों को ठीक से फिट ही नहीं किया गया, सिर्फ ढांचा बनाकर छोड़ दिया गया, जैसे सिर्फ औपचारिकता पूरी की गई हो। पहियों की क्वालिटी इतनी खराब है कि अगर बालिकाएं रोज इस्तेमाल करें तो साइकिल मुश्किल से दो महीने ही चल पाएगी। कई साइकिलों में ब्रेक भी नहीं थे। एक साइकिल को ठीक करने में दो से ढाई घंटे तक लग जाते हैं और कई बार बार-बार सेट करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि कई साइकिलें तो चलने लायक भी नहीं थीं और बालिकाएं उन्हें पकड़-पकड़ कर उनके पास लाई।
Author: Rainbow News Hindustan
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