सप्तम अश्वमेघ महायज्ञ के चौथे दिन सुंदर कांड का रसपान।
अयोध्या।
सप्तम अश्वमेघ महायज्ञ के चौथे दिन थाईलैंड और कंबोडिया से आए श्रद्धालुओं ने सुंदर कांड की कथा का रसपान किया। इस अवसर पर सदगुरु भगवान ने प्रवचन में सुंदर कांड के गूढ़ अर्थों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह केवल रामकथा का एक अध्याय नहीं, बल्कि मित्रता, त्याग, सेवा और धर्म के प्रति अडिग निष्ठा का प्रतीक है।
सदगुरु भगवान ने कहा, सुंदर कांड की सुंदरता उसके शब्दों में नहीं, बल्कि भावों में है। सच्ची मित्रता वही है जो संकट में साथ खड़ी हो और बिना स्वार्थ के धर्म के मार्ग पर चल पड़े। उन्होंने धर्म संगठन के कार्यकर्ताओं को संदेश दिया कि सेवा को गणना या लाभ-हानि से न जोड़ा जाए, बल्कि श्रद्धा और समर्पण से किया जाना चाहिए।प्रवचन में जटायु और सम्पाती के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए सदगुरु भगवान ने कहा कि धर्म के मार्ग में किया गया त्याग व्यर्थ नहीं जाता। कोई बलिदान देकर मार्ग दिखाता है और कोई तप व धैर्य से समाज को दिशा देता है।
सदगुरु भगवान ने प्रवचन के अंत में सुंदर कांड के संदेश को आधुनिक समाज के लिए प्रासंगिक बताते हुए कहा कि मित्रता, त्याग और निस्वार्थ सेवा समाज को जोड़ने वाली शक्ति हैं और यही जीवन को वास्तव में सुंदर बनाती हैं।इस अवसर पर श्रेष्ठाचार्य आचार्य सुदर्शन जी, राष्ट्रीय महासचिव धर्मानंद पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव सुक्रीत जी, मीडिया प्रभारी आचार्य विश्वामित्र, अवधुत अखिलेश्वरवानंद, पूर्ण कालिक आचार्य दिव्यानंद, आचार्य भागीरथी, आचार्य अटल और वरिष्ठ आचार्य अवधेश जी महाराज उपस्थित रहे।
Author: Rainbow News Hindustan
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