अश्वमेघ यज्ञ के शंखध्वनि की गूंज ने पूरे यज्ञ परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया अयोध्या नगर को।

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अयोध्या धाम में चल रहे सप्तम अश्वमेघ के तीसरे दिवस दिन प्रवचन की शुरुआत। सदगुरु से वरदान प्राप्त अवधूत। अखिलेश्वरा नंद के शंखनाद से गुंजायमान हुआ यज्ञ स्थल

अयोध्या।
जिस पावन भूमि को दशावतार प्रभु ने अपने अवतरण के लिए चुना, उसी दिव्य भूमि पर आज सप्तम अश्वमेघ महायज्ञ के अंतर्गत द्वितीय अश्वमेघ महायज्ञ का भव्य आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक यज्ञ भूमि की सेवा के लिए पूज्य सद्गुरु जी महाराज द्वारा इसी स्थान का चयन किया जाना भक्तों के लिए गौरव और आस्था का विषय बना हुआ है।
आज की सभा की शुरुआत अवधूत अखिलेश्वरा नंद द्वारा किए गए वृहद और दिव्य शंखनाद से हुई। शंखध्वनि की गूंज ने पूरे यज्ञ परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। विशेष उल्लेखनीय है कि सदगुरु भगवान द्वारा अवधूत अखिलेश्वरा नंद को बिना रुके शंखध्वनि करने का वरदान प्राप्त है, जिसके कारण यह शंखनाद सभा का विशेष आकर्षण रहा। श्रद्धालुओं ने इसे दैवी अनुभूति के रूप में महसूस किया और वातावरण “जय सदगुरु” व “हर हर महादेव” के उद्घोष से गूंज उठा।
महायज्ञ के दूसरे दिन पूज्य सदगुरु जी महाराज ने अपने प्रवचन में पवन तनय संकट हरण हनुमान जी की महिमा पर विस्तार से प्रकाश डाला। सदगुरु जी ने कहा कि हनुमान जी शक्ति, भक्ति और सेवा के अद्भुत संगम हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हनुमान जी को “हनुमान” इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनके भीतर अभिमान का लेश मात्र भी नहीं था। अपार बल और सामर्थ्य होने के बावजूद उनका जीवन पूर्णतः प्रभु श्रीराम की सेवा और समर्पण को समर्पित रहा।
सदगुरु जी महाराज ने अपने प्रवचन में यह भी कहा कि आज के युग में हनुमान जी का चरित्र मानव को विनम्रता, निस्वार्थ सेवा और कर्तव्यबोध का मार्ग दिखाता है। जब तक व्यक्ति के भीतर अभिमान रहता है, तब तक वह ईश्वर कृपा का पात्र नहीं बन सकता। हनुमान जी का जीवन इस सत्य का जीवंत उदाहरण है।
पूज्य सदगुरु भगवान ने अपने दूसरे प्रसंग में भक्तों को होलिका के जीवन प्रसंग के माध्यम से गूढ़ आध्यात्मिक संदेश प्रदान किया। प्रवचन के दौरान यज्ञ स्थल पूर्णतः शांत, गंभीर और भावविभोर वातावरण में परिवर्तित हो गया।
सदगुरु भगवान ने होलिका के तपस्वी जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि होलिका ने बारह वर्षों की कठोर साधना के पश्चात यह वरदान प्राप्त किया था कि वह अग्नि में कभी जल नहीं सकती। अपनी साधना और तपोबल के कारण होलिका को यह अटल विश्वास हो गया था कि वह अजेय है और किसी भी परिस्थिति में उसे कोई क्षति नहीं पहुँच सकती।
प्रवचन में सदगुरु भगवान ने उस करुण क्षण का उल्लेख किया, जब होलिका अपने अंत समय में प्रश्न करती है—
“नाथ, बारह वर्षों की कठोर साधना के पश्चात मुझे यह वरदान प्राप्त हुआ था कि मैं अग्नि में नहीं जल सकती, फिर मैं कैसे जल गई?”
इस प्रश्न के माध्यम से सदगुरु भगवान ने समझाया कि वरदान तभी तक फलदायी होता है, जब तक उसका उपयोग धर्म और मर्यादा के अनुसार किया जाए। जैसे ही साधना से प्राप्त शक्ति का प्रयोग अहंकार, अधर्म और निर्दोषों के विनाश के लिए किया जाता है, वही वरदान विनाश का कारण बन जाता है।
सदगुरु भगवान ने स्पष्ट किया कि होलिका का पतन उसकी साधना की कमी से नहीं, बल्कि अहंकार और अधर्म के पक्ष में खड़े होने के कारण हुआ। प्रह्लाद जैसे निष्कलंक भक्त को अग्नि में भस्म करने का प्रयास ही उसके विनाश का कारण बना। यही कारण है कि जिस अग्नि से उसे सुरक्षा का वरदान प्राप्त था, वही अग्नि अंततः उसके लिए प्रलय बन गई।
प्रवचन में यह संदेश भी दिया गया कि आज के समाज में व्यक्ति जब ज्ञान, धन या पद प्राप्त कर लेता है और उसका प्रयोग अन्याय के समर्थन में करता है, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है। होलिका का जीवन इस बात की चेतावनी है कि ईश्वर की कृपा और वरदान भी धर्म के अधीन होते हैं, अहंकार के नहीं।
होलिका प्रसंग पर आधारित यह प्रवचन श्रद्धालुओं के हृदय को गहराई से छू गया। यज्ञ स्थल पर उपस्थित भक्तों ने इसे आत्ममंथन का विषय बताया और सद्गुरु भगवान के संदेश को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।

इस दिव्य प्रवचन में श्रेष्ठा आचार्य सुदर्शन जी महाराज, राष्ट्रीय महासचिव श्री धर्मानंद पांडे, आचार्य अत्री, मीडिया प्रभारी आचार्य विश्वामित्र, आचार्य देवेंद्र,आचार्य जैनेन्द्र, आचार्य सुकृति , आचार्य अटल, मातेश्वरी धर्म सार टीम के आचार्य अवधूत अखिलेश्वरा नंद, आचार्य दिव्या नंद, जितेंद्र , राजकुमार, सुरेंद्र अर्जुन , आदि उपस्थित रहे ।

Rainbow News Hindustan
Author: Rainbow News Hindustan

Mo.9414526432

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