महाराज दशरथ जी के राज महल बड़ा स्थान में राम कथा का हुआ समापन।
अयोध्या
चक्रवर्ती महाराज दशरथ जी के राज महल बड़ा स्थान में राम कथा का हुआ समापन महंत श्री कृपालु दास जी महाराज ने बताया संत गोस्वामी जी भी राम जी के आगे नहीं सियाजू के आगे रोते हैं स्वतंत्र परमात्मा हमारी किशोरी जी के पीछे-पीछे चलने लगा तो हमारी किशोरी जो जो कहेंगे यह वही करेंगे इसलिए हमें भी इस बावड़ी में बड़ा आनंद आ रहा है और बावरी के बाद जो विधि होती है राम जी सियाजू के मांग में सिंदूर भरने जाए किसी कन्या के मांग में सिंदूर भरने जाता तो उसका हाथ सर्प की तरह हो जाता है ऐसे होता है ना सर्प की तरह की है ऐसा लग रहा है जैसे राम जी का हाथ सर्प की तरह है राम जी का हाथी सर्प है जानकी जी का मुख्य ही चंद्रमा है और यह जो लाल सिंदूर है यह मानव कमल का पराग है तो सर्प रूपी हाथ सीता जी रूपी चंद्रमा को सिंदूर रूपी लाल कमल का पराग देकर के अमृत पाना चाहता है ऐसे उत्प्रेक्षय हमारा सिंदूर के दो भाग होते हैं सिंदूर वजनी होता और सिंदूर में पर मिला होता इसका तात्पर्य क्या है बड़ा सुंदर सामाजिक संदेश है देखो विवाह के पहले दूल्हे का मन भी पैर की तरह चंचल हो सकता है पर चंचल होता है किसी कन्या के मांग में भर दिया जाता है इसका तात्पर्य है कि विवाह के पूर्व भले ही दूल्हे का मन पैर की तरह चंचल हो लेकिन जब वह किसी कन्या के मांग में सिंदूर भर दे तो उसके साथ दूल्हे के मन की भी चंचलता समाप्त होनी चाहिए और जिसके मांग में वह सिंदूर भरता है उसकी संपूर्ण निष्ठा एकमात्र इस कन्या के प्रति होनी चाहिए इसलिए जीवन भर मांग भरता एक बार मांग भरता है हमारी मांगे पूरी करो संस्कृत में मांग को सीमांत कहते हैं देखो तुम्हारी मांग हमारी सीमा के भीतर होनी चाहिए लाल खतरे का भी निशान है ऐसी मांग मत करना कि हम एक खतरा उठा करके मांग भर में पड़े तो तुम्हारी मांग तो हो लेकिन मैं सीमांत में सिंदूर भरा है तो मेरी सीमा के भीतर ही तुम्हारी मांग होनी चाहिए इसके बाद गोस्वामी बात करते हैं और जो तीन कन्याएं हैं उनके भी पानी ग्रहण की चर्चा की उसके तो कन्या प्रथम जो गुणशील सुख शोभा में सब रीति प्रीति समेत करी सो का विवाह भारत भैया के साथ हुआ श्री रामचरितमानस में जितने भी स्त्रियों का परिचय मानस कर देते हैं पिता से देते हैं अभी-अभी मांडवी जी का परिचय कुछ केतु कन्या प्रथम जो जानकी जी का परिचय जनक सुधार जग जननि जानकी मंदोदरी का महत्व नया मंदोदरी नाम पार्वती जी का जय जय गिरिराज किशोरी लेकिन एक अद्भुत प्रयोग है उर्मिला जी का परिचय पिता से नहीं दे रहे हैं जानकी जी से दे रहे हैं प्रभु श्री राम और भैया लक्ष्मण का प्रेम कैसा है कहा राम जी से भैया लक्ष्मण कहते हैं राघव भैया मैं आपको छोड़कर किसी को नहीं जानता और आपको छोड़कर मैं किसी को मानता भी नहीं ग्रुप में जानो किसी को नहीं जान और यदि मैं अपने जीवन में कभी किसी को स्वीकार भी करूंगा तो मन नहीं सदा ही राम के आपके नाते से ही स्वीकार करूंगा किसी को स्वीकार करूंगा नहीं तो तो कहा तब परिचय क्या देना पड़ेगा कहा श्री सीताराम जी में कोई भेद ही नहीं है गिरा अरथ नहीं परम प्रिय राम जी से तो नाता बन ही रहा है क्योंकि राम भी तो सीता जी को हो ही चुकी है और इनमें अभेद भी है तो किसके हाथ को ग्रहण करने यहां से सहस्त्र जगह कारण जो अवतार भूमि है लखन भैया है शेष और सुंदरियों में शिरोमणि है उर्मिला जी तो शिरोमणि को मनी को शेष को दे दिया गया और श्रुति कीर्ति जी का विवाह के साथ हुआ सुंदरी सुंदर वर्ण सब एक मंडप राज है एक भाई जीवन है का अभ्यांतर जीवन है जीवन में तो हम सभी विवाह देख ही रहे हैं हमारा अभियंतर जीवन भी तब धन्य हो जाएगा जब हमारा हृदय भी महाराज जनक का मंडप बन जाए अरे चारों दूल्हा और चारों दुल्हन सरकार हमारे हृदय में ही विराज जाए ऐसा लग रहा है तो ऐसा लग रहा है जैसे जीव के हृदय में चारों अवस्थाएं अपने प्रभु के साथ विराजित हो रहे हैं चार अवस्थाएं कौन-कौन होती हैं जाग्रत स्वप्न सूसूक्ति और पूरी चार अवस्थाएं और इन चार अवस्थाओं के विभु विश्व तेजस प्रज्ञा और ब्रह्म जो सबसे छोटे हैं कम से आप देख ले जो जागृत अवस्था है वह मानव श्री स्तुति करती भी है जो सपना अवस्था है मानव शरीर उर्मिला जी है और जो सशक्ति व्यवस्था है मानव शरीर सीता जी हैं और उनकी चार विभव विश्व तेजस प्रज्ञान और जो प्रज्ञा है वह भारत भैया है और जो ब्रह्म है वह श्री राम अवस्था विभिन्न सहित स्वरूप है वेदंतियों की बात हो गई लेकिन महाराष्ट्र की दशरथ जो है वेद स्वरूप है तो गोस्वामी जी ने उनकी ओर से भी कहा कि देखो दशरथ जी महाराज को क्या लग रहा है मुदित अवधपति सकल सूत्र निहार जनउपये महिपाल मनी क्रियां संपन्न हो गया इसके बाद कोहबर कपड़ा सुंदर वर्णन आता है अति संक्षेप में वर्णन जैसे जो श्री कृष्णा अनुरागी हैं उनके लिए कुंज की लीला महत्व रखती है वैसे श्री राम भक्ति में कोहबर की लीला महत्वपूर्ण है सखियां कुंवर में ले जाकर दूल्हा दुल्हन को बैठक के हंसविलास करती है कि यह देखा जाए कि दोनों में वर्क कौन है मैं श्रेष्ठ कौन है तो स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी अर्थ करते थे को है पर मैंने बर्मा होता है श्रेष्ठ इन दोनों,
बताओ उसको बार कब कहते हैं जब किसी कन्या के साथ उसका पानी ग्रहण होता है इसका मतलब कन्या ही उसे बार बना दिया बरमाने श्रेष्ठ बनती है विवाह के बाद ही हो व होता है तुम इतना के संत कर देंगे देखो राम जी को भी वर्ग किसने बनाया हमारी सियाजू ने बनाया यदि सिया क्यों नहीं होती तो राम जी भी बार कैसे होते ही बार बनाया और मिथिला ने ही राम जी को बार बनाया त्रिभुवन जय की उपाधि यहीं से मिली वैदेही तो मिला ही त्रिभुवन जय समेत वैदेही और उसके बाद यह पर भी बने यहां श्रेष्ठ भी बने तो सखियां गोबर में ले जाने के लिए आई तो विवाह की भी दो प्रकार की विधि है वैदिक विधि और लौकिक विधि वैदिक विधि से विवाह मंडप में संपन्न होता है लौकिक विधि से विवाह को ओवर में संपन्न होता है मंडप में जो ऋषि कहते हैं वह होता है गोबर में जो स्त्री करती है वह होता है मंडप में ऋषि प्रधान होते हैं गोबर में स्त्री प्रधान होती है मंडप में सारे पुरुष बैठते हैं स्त्री कन्याएं होती है और गोबर में सारी स्त्रियां होती है पुरुष केवल और सारे लोग तो चले गए जन्माष्टमी की ओर शक्तियों का दूल्हा सरकार उठो दूल्हा उठे और धीरे-धीरे चलने लगे सरकार धीरे-धीरे चल रहे हैं आप सब इतनी पढ़ी-लिखी हो कोई उपमा आती हो तो जरा सरकार कैसे चल रहे हैं कैसे दूसरे का सखी पर और वर्द दोनों की राशि तो एक ही होती है राशि एक होने से वर्ग को वर्द कहा जा सकता है यह तो उचित नहीं है क्या समझ लिया वरदान देता है उसको मर्द कहते हैं जो आप समझाना चाह रही है तब मैं समझ लेती की वरदान देने वाले को व्रत रहते हैं लेकिन आपने तो कोल्हू का व्रत कहा तो फूलों का व्रत वरदान तो देता नहीं है फूलों में तो बैल ही लगाए जाते हैं तो वर्द का एक अर्थ तो बल होता है और दूल्हे को कोल्हू के बल की उपमा देना उचित है क्या दूल्हा सरकार लंबा-लंबा तक भर रहे हैं कोई उपमा हो तो दो उसे सखी ने कहा सखी ऐसा लग रहा है जैसे बंधन से छूट करके कोई आज तेजी से भागता है ऐसे दूल्हा सरकार भी तेजी से भाग रहे चल रहे हैं जैसे कुटे से बकरे को छोड़ो लंबी चलांग लगाकर दौड़ता है ऐसे दूल्हा तेजी से चल रहा है केवल बकरा नहीं होता आज मन अजन्मा भी होता है ईश्वर को भी आज कहते हैं और दूसरी बात उनके पिता के पिता का नाम भी आज है तो आज के वंशज होने के कारण भी इनको आज कहा जा सकता है
Author: Rainbow News Hindustan
Mo.9414526432





