अध्यापन में अध्यापक की आवाज की भूमिका।लेखक जसवंत दवे
फालना,पाली
साम्भा कितने आदमी थे? यह डायलाग सुनते ही आपके जेहन में शोले फिल्म के पात्र गब्बर सिंह का ख्याल आता है। जिसकी रोबीली और भय उत्पन्न करने वाली आवाज से हर कोई परिचित है आप को कैसा लगेगा यदि अध्यापक की आवाज ऐसी हो। एक अध्यापक की आबाज उसके व्यक्तित्व का प्रतिबिंब होती है। अगर वह आवाज प्रेरक, प्रभावशाली और स्पष्ट तथा ऊर्जा से भरपूर है तो शिक्षण न केवल रोचक बनता है बनिक छात्रों की सीखने की रुचि और एकाग्रता भी बढ़ती है। एक प्रभावशाली अध्यापक की आवाज उसके शिक्षण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होती है। अध्यापक को शब्दों का उच्चारण शुद्ध और यही करना चाहिए। उच्चारण पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है क्योंकि छात्र उसी का अनुसरण करते हैं। अध्यापक की आवाज में अस्पष्टता: तथा बहुत तेज नहीं होनी चाहिए। चीखना पढ़ाना नहीं है। कई बार अध्यापक अपनी बात को समझाने के लिए जोर-जोर से बोलने लगते है ऐसा करने पर छोटे बालकों पर गलत असर पड़ता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा है किसी विषय को पढ़ाना केवल किताबों से नहीं होता, वह तो बोलने वलि की वाणी में जीवंतता से होता है।” शिक्षण में भावनात्मक उत्तार चढ़ाव बहुत जरूरी है। एक रस सपाट आवाज से छात्र उकता सकते हैं। जब कोई कहानी बताई जा रही हो, तो संवादों में भाव दिखना चाहिए। स्वयं शिक्षक की आवाज में काम झिझक, संकोच था डर नहीं झलकना चाहिए, इससे छात्रों में विश्वास उलन्न होता है और वे ध्यानपूर्वक सूनते है। यदि कोई छात्र प्रश्न पूछ रहा होतो सहायक लहजा अपनाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि यदि कक्षा-कक्ष बड़ा है तो आवाज 60 डेसिबल के 70 डेसिबल तक हो सकती है। यदि कक्ष में आवाज गूंजती है या अवशोषित हो जाती है तो थोड़ा तेज बोला जा सकता है। तकनीक के इस दौर में माइक का उपयोग किया जा रहा है जो उचित भी है। स्मार्ट क्लास में आवाज को नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन जब तक बोलने वाले के स्वर पर ध्यान नहीं दिया गया तो क्लास का उपयोग बेकार सिद्ध होगा।इस हेतु ध्यान दिए जाने की आवयश्कता है।
Author: Rainbow News Hindustan
Mo.9414526432





