चितौडगढ नरेन्द्र सेठिया
सीने पर गरजती बंदूकें, हाथों में फूटती पटाखों की लड़ियां।
रामसर साईट मेनार में युवाओं ने की बारूद से ठिठोली
मेनार। मेवाड़ की पारंपरिक वेशभूषा में सैनिक और जोश व उत्साह से लबरेज मोर्चाबंदी के साथ बंदूकों से हवाई फायर, तोपों से दागते गोले, मेहमानों व सैनिकों स्वागत में चेहरे पर उड़ती गुलाल, इतिहास का वाचन, राजसी ढोल की थाप पर तलवारों-खांडां से गेर नृत्य व अखाड़ा प्रदर्शन और अगले साल फिर आने के निमंत्रण की मुनादी। जीं हां, ऐसा ही नजारा देखा गया बुधवार को उदयपुर के विश्व प्रसिद्ध बर्ड विलेज और रामसर साईट मेनार में। जहां मुगल सेना पर विजय का जश्न जमराबीज पारंपरिक तरीके से मनाई गई।
आपको बतादें कि जब मुगलकाल में जब औरंगजेब की सेना चितौड़गढ से उदयपुर की ओर बढ रही थी, तब सेना ने मेनार के पास एक वट वृक्ष के नीचे विश्राम किया था। जिसे आज भी फौज वड़ली कहा जाता है। गांव के मेनारिया समाज को यह मालूम होने पर उन्होंने एक योजना के तहत सेना को होली के दूसरे दिन गांव में बुलाकर वहीं कत्लेआम मचा दिया। मुगलसेना पर विजय का यह पर्व जमराबीज के तौर तब से आज तक मनाया जा रहा है।
विजय का पर्व बुधवार को भी दोपहर में औंकारेश्वर चबूतरे पर मेवाड़ के तत्कालीन शासक की ओर से दी गई लाल जाजम पर अमल लेने की रस्म के साथ प्रारंभ हुआ। रात नौ बजे गांव के युवा बुजुर्ग और युवा पारपंरिक वेशभूषा के साथ बारूद भरी बंदूकें लिए मशालों के साथ औंकारेश्वर चबूतरे की ओर बढे और वहां के सभी पांच रास्तों पर मौर्चाबंदी के तौर पर एकत्रित हुए, इस दरम्यान भी मुगलसेना पर जीत के उत्साह में बंदूकों से हवाई फायर करते दिख तो आतिशबाजी भी। ठीक रात दस बजे मोर्चाबंदी खोली गई तो औंकारेश्वर चौक सैकड़ो बंदूकों से एक साथ हवाई फायर से दहल उठा। रणबांकुरे ढोल की थाप और आवाज के बीच करीब एक घंटे के हवाई फायर, तोपों की गर्जना और पटाखों की लड़ियां हाथ में लेकर आतिशबाजी देखकर दर्शकों व अतिथि भी आश्चर्य चकित हुए बिना नहीं रह सके, क्योंकि मेनार के मासूम बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक बारूद के साथ ठिठोली कर रहे थे। इसी दरम्यान गांव के जैन समाज की ओर से स्थानीय ग्रामीणों व मेहमानों का गुलाब अबीर से स्वागत किया गया। हवाईफायर और आतिशबाजी के बाद सभी ग्रामीण व मेहमान गांव के फेरावतों की अगुवाई में जमराघाटी पहुंचे जहां महिलाएं गीत गाती हुई होली को शीतल करने पहुंची तो, राधाकिशन नगारची व उनके परिजनों ने गांव और मेनारिया समाज के इतिहास का वाचन किया। इतिहास वाचन के बाद एक फिर सभी ढोल और बांकिया की सुमधुर ध्वनि के साथ औंकारेश्वर चौक पंहुचे, जहां हुर्रेरे हुर्रेरे की गगनभेदी आवाज के साथ तलवारों और खांडो से गेर नृत्य किया गया तो अखाड़ा प्रदर्शन व तलवारबाजी में युवाओं ही नहीं बडे बुजुर्गों ने भी हुनर दिखाया तो मेहमानों को भी अपनी कला दिखाने का अवसर दिया। आखिर में गांव के हरकारे शोभालाल सालवी की ‘अगले साल फिर पधारना’ की मुनादी के साथ पर्व का समापन किया गया।
Author: Rainbow News Hindustan
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