सद्गृहस्थों को रात्रिभोजन का अवश्य त्याग करना चाहिए।
फालना,पाली
जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी म. सा. ने श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक तपागच्छ जैन संघ-फालना के श्री सर्वोदय पार्श्वनाथ आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा को प्रवचन देते हुए कहा कि –
जगत् के जीवों में रहे अज्ञान के अंधकार को दूर करने के लिए केवलज्ञान की प्राप्ति के बाद तीर्थकर परमात्मा प्रतिदिन दो प्रहर तक धर्मदेशना देते हैं।
24 वें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी प्रभु ने तो अपने निर्वाण के पूर्व दो दिनों निरंतर सोलह प्रहर रूप 48 घंटों तक धर्मदेशना प्रदान की। इसके पीछे परमात्मा का एक ही लक्ष्य था, जगत् के जीवों को पूर्ण सुखी बनाना।
परमात्मा ने धर्म बताने के साथ परम विशुद्ध जीवन शैली भी बताई है। साधु जीवन के कर्तव्य और गृहस्थ जीवन के कर्तव्य भी बताए है।
जीवन जीने के लिए प्रत्येक मनुष्य को आहार की आवश्यकता रहती है परंतु आहार लेना हो तो तो सूर्य के अस्तित्व की आवश्यकता है।
सूर्य की गर्मी से दिन में लिये हुए भोजन का पाचन होता है एवं सूक्ष्मजीवों की उत्पत्ति नहीं होती है। जबकि रात्रि में लिए हुए भोजन का सूर्य की गर्मी के अभाव में पाचन नहीं होता, तो साथ ही अनेक सूक्ष्म जीवाणुओं की उत्पत्ति होने से वे भोजन में गिरने से शरीर में अनेक रोगोत्पत्ति का कारण भी बनता है।
मात्र तीर्थंकरों ने नहीं बल्कि अन्य धर्मों के ऋषि मुनिओं ने भी रात्रिभोजन का निषेध किया है। यज्ञ, दान, श्राद्ध, देवताओं की पूजा एवं भोजन का कार्य तो दिन में ही होना चाहिए। ऐसी अनेक बाते स्मृतिग्रंथों में भी देखी जाती है।
अतः सद्गृहस्थ को अपने जीवन में रात्रिभोजन का त्याग अवश्य करना चाहिए। प्रवचन के बाद जैनाचार्यश्री के पगले रमेशकुमार मोहनलालजी एवं पारसभाई बागरेचा के घर हुए।
दि. 11 एवं 12 – फरवरी को जैनाचार्यश्री की स्थिरता सुमेरपुर में होगी तथा दि. 13 से 22 फरवरी तक भारुन्दा में जैन मंदिर की अंजनशलाका प्रतिष्ठा प्रसंग होगा।
Author: Rainbow News Hindustan
Mo.9414526432





