चितौडगढ से व् नरेन्द्र सेठिया की रिपोर्ट
बुजुर्ग के सामाजिक बहिष्कार के कथित फरमान पर न्यायालय का कड़ा रुख।
81 वर्षीय व्यक्ति को समाज से बाहर करने और हुक्का-पानी बंद करने के मामले में 14 लोगों के विरुद्ध प्रसंज्ञान
80 वर्षीय अधिवक्ता नारायण सिंह खंगारोत ने की पैरवी, बुजुर्ग को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई बनी चर्चा का विषय
खबर का लौकेशन मण्डफिया, चित्तौड़गढ़। सामाजिक बहिष्कार के नाम पर किसी व्यक्ति को समाज से अलग-थलग करने और उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के कथित मामले में न्यायालय ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। 81 वर्षीय परिवादी नानालाल गाडरी ने 1 मार्च 2024 को न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर अपने सामाजिक बहिष्कार और कथित अपमान की शिकायत की थी। इस मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट, मण्डफिया ने 14 व्यक्तियों के विरुद्ध मानहानि के अपराध में प्रसंज्ञान लिया है। आरोप है कि परिवादी को समाज से बहिष्कृत करने, उसके परिवार से संबंध रखने वाले लोगों पर ₹5 लाख का दंड लगाने तथा सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों से दूर रखने का फरमान जारी किया गया था।
परिवाद के अनुसार, गोपाल गाडरी की मृत्यु के संबंध में मुस्ताक खान के विरुद्ध बयान देने से इनकार करने पर परिवादी को कथित रूप से समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था। आरोप है कि सार्वजनिक देवरे पर आयोजित पंचायत में उसके सामाजिक बहिष्कार का निर्णय लिया गया तथा लिखित फरमान तैयार किया गया, जिसमें परिवादी को बुलाने अथवा उसके घर जाने वाले व्यक्ति पर ₹5 लाख का दंड लगाने की बात कही गई थी।
परिवाद में यह भी आरोप लगाया गया कि सामाजिक बहिष्कार के कारण परिवादी और उसके परिवार को विवाह, धार्मिक एवं सार्वजनिक आयोजनों से अलग रखा गया। परिवादी के बड़े भाई के निधन के बाद पारिवारिक शोक-संबंधी परंपराओं के निर्वहन में भी कथित रूप से बाधाएं उत्पन्न की गईं। परिवादी का कहना था कि इन परिस्थितियों से उसे और उसके परिवार को गहरा मानसिक आघात पहुंचा तथा समाज में उसकी प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।
परिवादी के शपथबद्ध बयानों, गवाहों के कथनों और उपलब्ध दस्तावेजों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने पाया कि 14 व्यक्तियों के विरुद्ध मानहानि के मामले में आगे कानूनी कार्यवाही करने के पर्याप्त प्रारंभिक आधार मौजूद हैं। न्यायालय ने उनके विरुद्ध प्रसंज्ञान लेकर उन्हें समन के जरिए तलब करने तथा प्रकरण में आगे विचारण किए जाने का आदेश दिया।
इस मामले का एक उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि 81 वर्षीय परिवादी की ओर से 80 वर्षीय अधिवक्ता श्री नारायण सिंह खंगारोत ने पैरवी की। उम्र के इस पड़ाव पर भी अधिवक्ता द्वारा एक बुजुर्ग व्यक्ति के सम्मान और अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना इस मामले का मानवीय पक्ष सामने लाता है। समाज से बहिष्कार जैसे संवेदनशील विषय पर न्यायालय का यह आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि ऐसे आरोपों का समाधान कानून की प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।
यह प्रसंज्ञान का आदेश है, दोषसिद्धि का नहीं। अभियुक्तों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर अंतिम निर्णय विचारण के दौरान साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद होगा।
Author: Rainbow News Hindustan
Mo.9414526432





