भगवान श्रीराम हों या श्रीकृष्ण सभी ने लोककल्याण का मार्ग प्रसस्थ किया।
संजय यादव अयोध्या।
अयोध्या चक्रवर्ती महाराज दशरथमहल में पर आयोजित श्री मद कथा आठवे दिवस पर कथा व्यास मनोज मोहन शास्त्री ने अपनी मधुर वाणी भजनों से भव्य पंडाल को राममय करते हुये कथा को विस्तार देते कहा कि 30 अप्रैल मई होने वाले मखौड़ाधाम में विशाल यज्ञ का आयोजन होगा आप लोगों से निवेदन है का अधिक से अधिक पहुंचे। कथा व्यास शास्त्री ने आगे कहा भगवान श्रीराम हों या श्रीकृष्ण सभी ने लोककल्याण का मार्ग प्रसस्थ किया। आज प्रभु का मंदिर सनातन के साथ संस्कार और संस्कृति के पुरूर्थान की स्थापना का द्योतक है।
अयोध्या और जनकपुर का संबंध दो शरीर और एक आत्मा का परिचायक है।
कथा जीवन को मंगल कर हमारे जीवन को सुंदर सदन बनाती है। श्रीराम जी की लीलाओं का दर्शन सुनने और देखने मात्र से आत्म सुद्धि होती है।
दीन दुखियों की सेवा ही भगवान की सेवा है।
व्यास श्री मनोज मोहन शास्त्री ने भगवान श्रीराम द्वारा धनुष भंग, परशुराम, लक्ष्मण संवाद एवं श्रीराम विवाह की रोचक प्रसंगों से श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया।
संत शास्त्री ने कहा कि जब विश्वामित्र ने सम्पूर्ण उत्तर भारत को दुष्टजनों से श्रीराम द्वारा मुक्त करा लिया एवं सभी ऋषि वैज्ञानिकों के यज्ञ सुचारू रूप से होने लगे तो विश्वामित्र श्रीराम को जनकपुरी की ओर ले गये जहां पर सीता स्वयंवर चल रहा था। सीता स्वयंवर में जब कोई राजा धनुष को नहीं तोड़ पा रहा था तो श्रीराम ने विश्वामित्र की आज्ञा पाकर धनुष को तोड़ दिया जिसका अर्थ पूरे विश्व में दुष्टों को सावधान करना था कि अब कोई चाहे कितना भी शक्तिशाली राक्षस वृत्ति का व्यक्ति हो वह जीवित नही बचेगा।
धनुष टूटने का पता चलने पर परशुराम का स्वयंवर सभा में आना एवं श्रीराम लक्ष्मण से तर्क वितर्क करके संतुष्ट होना कि श्रीराम पूरे विश्व का कल्याण करने में सक्षम है स्वयं अपने आराध्य के प्रति भक्ति में लीन हो गये एवं समाज की जिम्मेदारी जो परशुराम ने ले रखी थी जिससे कि दुष्ट राजाओं को भय था परशुराम ने वह सामाजिक जिम्मेदारी श्री राम को सौंप दी एवं स्वयं भक्ति में लीन हो गये। कथा व्यास ने आगे कहा कि भगवान कण-कण में विराजमान है। अगर हम समाज में दीन-दुखियों वनवासियों आदिवासियों के कष्ट दूर करते हए उस संगठित शक्ति के द्वारा ही सामाज में व्याप्त बुराईयों को दूर किये किसी कारण से श्री राम भगवान कहलाये उसी प्रकार आज भी समाज में व्याप्त बुराईयों को अच्छे लोग संगठित होकर ही दूर कर सकतें है। कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए व्यास जी ने कहां कि राजा जनक ने राजा दशरथ को बारात लाने का न्यौता भेजा एवं राजा दशरथ नाचते गाते बारातियों सहित जनकपुरी पहुंचे। बारात में शामिल उपस्थित श्रोता जनसमूह खूब भाव पूर्ण नाचे गाये।
पूज्य अतुल कृष्ण भारद्वाज ने श्रोताओं से आग्रह पूर्वक निवेदन करते हुए कहा कि जिस संगठित शक्ति के बल पर वनवासी गिरिवासी बंधुओं ने आपत्तिकाल में श्रीहनुमान जी महराज के नेतृत्व में धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए स्तुत्य कार्य किया, उसी प्रकार समस्त प्रकार के भेद-भावों से रहित होकर हम सबको जीवन में कुछ महान कार्य करने की ललक पैदा करना चाहिए। जिससे आज समाज में पैदा भेद भाव उच नीच छुआ छुत दूर हो सकें।
Author: Rainbow News Hindustan
Mo.9414526432





